Oct 25, 2009

खुद को ही यहाँ बहकाने लगे हैं.

आजकल वो भी आँखों में नए सपने सजाने लगे हैं,
लगता हैं की वो भी उन इश्क की गलियों में जाने लगे हैं.
रखते हैं खुद को हर दम वो कुछ खिला-खिला सा ऐसे ,
जैसे किसी की नजरो में खुद को थोडा और चढ़ाने लगे हैं.
खूब सजना -सवारना और रहना हरदम बिलकुल चकाचक,
ऐसा लगता हैं जैसे दिन में दो बार वो आजकल नहाने लगे हैं.
इस तरह से नहीं जीता जाता हैं यहाँ दिल किसी का मंगल,
ये ऐसे हैं जैसे जान-बूझकर वो खुद को ही यहाँ बहकाने  लगे हैं...

4 comments:

  1. शुरूआत शायराना और बीच में दो बार नहाने का हास्य अच्छा लगा ।
    बधाई ।

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