आजकल वो भी आँखों में नए सपने सजाने लगे हैं,
लगता हैं की वो भी उन इश्क की गलियों में जाने लगे हैं.
रखते हैं खुद को हर दम वो कुछ खिला-खिला सा ऐसे ,
जैसे किसी की नजरो में खुद को थोडा और चढ़ाने लगे हैं.
खूब सजना -सवारना और रहना हरदम बिलकुल चकाचक,
ऐसा लगता हैं जैसे दिन में दो बार वो आजकल नहाने लगे हैं.
इस तरह से नहीं जीता जाता हैं यहाँ दिल किसी का मंगल,
ये ऐसे हैं जैसे जान-बूझकर वो खुद को ही यहाँ बहकाने लगे हैं...
aap ne to gajab kar diya.narayan narayan
ReplyDeleteishk ki bahakati duniya men swagat.
ReplyDeleteSundar panktiya.
ReplyDeleteशुरूआत शायराना और बीच में दो बार नहाने का हास्य अच्छा लगा ।
ReplyDeleteबधाई ।