Feb 9, 2010

न जाना होता....

मैं अपनी जिंदगी के किस अजीब से मोड़ पर खड़ा हूँ,
इस मोड़ के हर तरफ बस सड़क ही सड़क जाती हैं.
हर एक सड़क खुद रहगुजर है किसी अपनी मंजिल की,
वो मंजिल जो कभी मेरी जिंदगी का आखरी मकसद थी.
जाने आज फिर से क्यों हवा उसी मंजिल को बह रही हैं?
और न चाहते हुए भी मुझे उसी पुरानी राह पर जाना होगा.
यूँ तो हर राह की खुद अपनी एक बिल्कुल अलग कहानी है,
मगर मुझे तो इस राह की जुबानी अपनी कहानी सुनानी हैं.
कभी खड़ा रहता था हर दम दिल से में बस उसकी राह पर,
पर जाने क्यूँ मेरे हम दम ने मुझे और राह दोनों को बदल दिया?
माना मैं नहीं था कभी भी तेरे दिल और तेरे प्यार दोनों के काबिल
अरे मुझ से सिर्फ कहा होता, मैं खुद ही अपनी राहों को बदल देता.
और इस तरह तेरे उस हम दम को तेरे जीते-जी कभी भी मंगल,
छिपने के लिए इस दुनिया से उस दुनिया की राह पर न जाना होता..

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