Feb 26, 2010

"अगर मैं लिखू"

अगर मैं लिखू उनकी काली-चमकीली जुल्फों को काली बदली के जैसा.
अब भला कोई बादल भी इतना कला और घना इन दिनों होता हैं कहीं.
अगर मैं लिखू उनकी दोनों आँखों को किसी म्रग जैसा तो मुमकिन नहीं,
जो कशिश हैं आँखों में उनकी वो अब वो हिरन में भी ढूंढें से मिलती नहीं.
हर दफा उन्होंने लुटा हैं हमे अपने रेशमी से चेहरे की दिल-कश लाली से,
लाख ढूँढने पर भी हमे ये लाली जहाँ की किसी बगिया में कहीं मिलती नहीं.
छिपा कर रखिये जरा अपने गुलाब की नरम पत्तियों से नाजुक गुलाबी लबों को,
हर शख्स पूछता हैं मुझसे की जाने क्यूँ अब ये सारे गुलाब पहले जैसे गुलाबी नहीं?
हो सके मुमकिन तो अब ऐसे हर एक बात पर मुस्कराना बंद कर दो मेरे हुजुर जरा,
इन दिनों यूँ चमकना आसमानी बिजली का जरा-जरा सी बात पर कोई अच्छा नहीं.
जब भी निकलो सरे-राह खुद को जरा सा आँचल के पीछे मेरे सनम छुपा कर रखना,
देखे कोई मेरे सिवाय तेरे इस शीशे से हुस्न को ऐसा कुछ भी दिल को मेरे जचंता नहीं.
अरे ! बलखाती चाल तो हैं तेरे महबूब की जैसे हवा में सरकता कोई सुखा सा पत्ता मंगल,
हर कदम पर अपनी अदाओ से धड़काना मेरे दिल को  इश्क में कोई अच्छी बात  नहीं...

1 comment:

  1. आप और आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ...nice

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