वो लिपटे हैं गले आकर मेरे उस कड़कती बिजली के डर से,
ला इलाही मेरे ये बारिश अब कम से कम दो दिन तो बरसे.
उफ़ तेरी आरजू-ऐ-फरेब में न आ जाऊ कहीं सनम मेरे,
न देखो तुम मुझे मोह्हबत से अपनी इस नशीली नज़र से.
बहुत दिनों में कोई आ रहा हैं आज घर पर मेरे मुश्किल से,
अगर हो सके मेरे खुदा तो आज बस आसमान से नूर ही बरसे.
सिर्फ सुनेगा मेरे शेर और तेरे ऊपर लिखी मेरी ग़ज़ल-नगमो को ,
एक बार अगर देख ले तुझे कोई इस जहाँ में मेरी वाली नज़र से.
जितना भी जाना है जाना है उनको बहुत ही थोडा सा तुमने मंगल,
हर दफा आते हैं वो नज़र अलग से जाने क्यों मुझको अपनी हर नज़र से....
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