सिर्फ एक फैसले ने थाम दी इन दिनों साँसे सभी की,
उस घर का मालिक तेरा खुदा हैं या मेरा भगवान हैं?
डरती हैं हर माँ जब बेटा निकलता हैं बाहर घर से,
कहीं खो न दे उस लखते-जिगर को जो उसकी जान हैं.
किस तरह से सिकती हैं राजनीति की रोटियां नाम से उसके ,
इस बात पर होता खुद उपरवला भी आज कल बड़ा हैरान हैं.
बहुत आराम से बैठे हैं ये सियासत करने वाले घर में,
अगर हैं कोई मुश्किल में तो बाहर सड़क का आम इंसान हैं.
सोचता हूँ इन -दिनों देख किसी को डरा और सहमा हुआ सा,
कहा चुप गया जाकर कोने में अपना वो आसमानी निगहबान हैं?
हो सके तो माफ़ करना इस बात के लिए मुझको खुदा मेरे,
सवाल हैं मेरा क्या सच में होता तू कोई भगवान हैं.
मिलती है खुशी अगर उसको रुलाकर अपने इन बच्चों को,
न है वो खुदा तेरा और न हो सकता वो मेरा भगवान हैं.
हो सके तो न पूछना इस एक सवाल को फिर कभी किसी और से,
हिन्दू हैं कोई मेरे देश का या फिर तू उस देश का मुसलमान हैं.
क्या गलत हैं गर रहे तेरा खुदा सामने मेरे भगवान के ?
जब इस तरीके से मुमकिन भारत की उन्नति और बढती शान हैं.
सुना दो सबको मजहब से कहीं ज्यादा बड़ी होती इंसानियत मंगल ?
मुमकिन नहीं खुदा इंसान के बिना जब इंसान से ही उसकी पहचान हैं.
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