पत्थर को दिल का हाल सुनाने चला हूँ,
अपनी रूठी हुई किस्मत को मनाने चला हूँ.
अपनी नाकाम हसरतों का जनाजा उठाये हुए,
मैं आज भी उनसे खुद ही वफ़ा निभाने चला हूँ.
वो बेवफा न थे मैं बदनसीब था शायद,
यही एक राज़ इस ज़माने को बताने चला हूँ.
ओ सावन की घटाओं कल आकर उमड़ना,
आज तो मैं खुद के आंसू बहाने चला हूँ.
जहाँ बनाये थे मैंने आशियाने कभी दिल के अपने,
आज हर एक उसी साख को जड़ से जलाने चला हूँ.
कहीं तेरी शायरी किसी का दिल न दुखा दे मंगल,
इसलिए अपनी ग़ज़ल तन्हाई को सुनाने चला हूँ......
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