जब से इस ग़म की फितरत है ऐसे मुझको सताने की,
तब से मेरी भी बस एक ही जिद है उसे सच में हराने की.
माना की ये भी सच है की छुपा न पाउँगा आँखों की नमी,
कुछ खास नहीं ये तो अपनी कोशिश है कुछ मुस्कुराने की.
खुदा कसम! आज भी दिल है तुम्हारा एक सच्चे मोती जैसा,
तो फिर भला और क्या ज़रूरत तुम्हे यूँ कुछ नए खजाने की.
अपनी हद से ज्यादा उसको टूट कर चाहना और फिर मर जाना,
वाह -वाह क्या खूब बढ़िया बनाई है उस खुदा ने तकदीर परवाने की.
मेरी इस जिन्दा लाश के अकेले धड़कते सीने की कब्र में दिल है मुर्दा,
छोड़ो ऐसे न करो जिद मुझे और मेरे गमो को फिर से जिलाने की.
जब चले गाँव से तो खेत छूटे और न शहर में मुझको रोज़गार मिला,
शायद जिंदगी देती है यूँही सबसे बड़ी सजा गाँव से शहर में आने की.
कुछ गलत न समझना! सबसे आखिर में मुफलिसी में पुकारा है मंगल,
हो सकता है की मेरे दिल और दिमाग ने आज ठानी है तुझे आजमाने की....
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