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Jan 31, 2010

"न जाना होता....."

मैं अपनी जिंदगी के किस अजीब से मोड़ पर खड़ा हूँ,
इस मोड़ के हर तरफ बस सड़क ही सड़क जाती हैं.
हर एक सड़क खुद रहगुजर है किसी अपनी मंजिल की,
वो मंजिल जो कभी मेरी जिंदगी का आखरी मकसद थी.
जाने आज फिर से क्यों हवा उसी मंजिल को बह रही हैं?
और न चाहते हुए भी मुझे उसी पुरानी राह पर जाना होगा.
यूँ तो हर राह की खुद अपनी एक बिल्कुल अलग कहानी है,
मगर मुझे तो इस राह की जुबानी अपनी कहानी सुनानी हैं.
कभी खड़ा रहता था हर दम दिल से में बस उसकी राह पर,
पर जाने क्यूँ मेरे हम दम ने मुझे और राह दोनों को बदल दिया?
माना मैं नहीं था कभी भी तेरे दिल और तेरे प्यार दोनों के काबिल
अरे मुझ से सिर्फ कहा होता, मैं खुद ही अपनी राहों को बदल देता.
और इस तरह तेरे उस हम दम को तेरे जीते-जी कभी भी मंगल,
छिपने के लिए इस दुनिया से उस दुनिया की राह पर न जाना होता..

Sep 24, 2009

"शहद"


आज फिर से मेरा महबूब मुझे ज़माने से जुदा लगता है,


दोनों नज़रों से मेरा कातिल और दिल से खुदा लगता है.


जाने कौन सा रौशन नूर झिलमिलाता है उनके चेहरे पर,


जिसके सामने आज सूरज भी मुझे बुझा-बुझा लगता है.


अरे छोडो भी और अब न पूछो मुझसे ही खैरियत मेरी,


अरे दिल तो पहले ही गया था अब होश भी गुमा लगता है.


ये बड़ी महकी-महकी सी खुबसूरत चांदनी रात क्यों आज है?


ओह! इस चश्मे शब को शायद उन्होंने ही अपने हाथों से छुआ लगता है.


मैं और क्या चाहू? जब मेरे जीने का सबब है उनके होंठों की हंसी मंगल,


तेरे इन गुलाबी लबों से निकला हर लब्ज मुझे जैसे शहद में घुला लगता है....