Sep 24, 2009

"शहद"


आज फिर से मेरा महबूब मुझे ज़माने से जुदा लगता है,


दोनों नज़रों से मेरा कातिल और दिल से खुदा लगता है.


जाने कौन सा रौशन नूर झिलमिलाता है उनके चेहरे पर,


जिसके सामने आज सूरज भी मुझे बुझा-बुझा लगता है.


अरे छोडो भी और अब न पूछो मुझसे ही खैरियत मेरी,


अरे दिल तो पहले ही गया था अब होश भी गुमा लगता है.


ये बड़ी महकी-महकी सी खुबसूरत चांदनी रात क्यों आज है?


ओह! इस चश्मे शब को शायद उन्होंने ही अपने हाथों से छुआ लगता है.


मैं और क्या चाहू? जब मेरे जीने का सबब है उनके होंठों की हंसी मंगल,


तेरे इन गुलाबी लबों से निकला हर लब्ज मुझे जैसे शहद में घुला लगता है....

No comments:

Post a Comment