Sep 6, 2009

"खास कब्र"

आजकल फिर से कलियाँ मुस्कराने लगी है,
मेरे बरसो पुराने जख्म फिर से जगाने लगी है.

तेरे बाद चलना तो दूर मै तो घिसट भी नहीं सकता,

चल अब तू ही मिल जा मुझे किसी एक पुराने बहाने से.

जो न कर सका था वफा चाहकर भी मुझसे प्यार में,

आज भी उसी बेवफा का इंतज़ार करता हूँ पुराने ठिकाने पे.

जो सूख गए थे मेरी मोह्हबत के फूल लगे हुए उनके जूडें में,

याद कर उनकी जुल्फों को उन्ही रेशमी बालों को सूंघता हूँ.

लेकर फिरता है अपनी ही लाश को इश्क में यहाँ-वहां मंगल

शायद उनके घर के नजदीक ही किसी खास कब्र को ढूंढता हूँ.......

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