Sep 20, 2009

मेरे फ़साने

किताबों में मेरे फ़साने ढूँढ़ते हैं

नादान हैं गुज़रे ज़माने ढूँढ़ते हैं

जब वो थे तलाश ये ज़िन्दगी भी थी

अब तो मौत के ठिकाने ढूँढ़ते हैं

कल खुद ही अपने महफिल से निकाले थे

आज हुए से दीवाने ढूँढ़ते हैं

मुसाफिर बेखबर हैं तेरी आँखों से

तेरे शहर में मयखाने ढूँढ़ते हैं

तुझे क्या पता ये सितम देने वाले

तेरे दिए ज़ख्म में प्यार के नजराने ढूँढ़ते हैं

निकल आते हैं अश्क हँसते-हँसते मंगल,

तभी तो लोग यहाँ रोने के बहाने ढूँढ़ते हैं

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