किताबों में मेरे फ़साने ढूँढ़ते हैं
नादान हैं गुज़रे ज़माने ढूँढ़ते हैं
जब वो थे तलाश ये ज़िन्दगी भी थी
अब तो मौत के ठिकाने ढूँढ़ते हैं
कल खुद ही अपने महफिल से निकाले थे
आज हुए से दीवाने ढूँढ़ते हैं
मुसाफिर बेखबर हैं तेरी आँखों से
तेरे शहर में मयखाने ढूँढ़ते हैं
तुझे क्या पता ये सितम देने वाले
तेरे दिए ज़ख्म में प्यार के नजराने ढूँढ़ते हैं
निकल आते हैं अश्क हँसते-हँसते मंगल,
तभी तो लोग यहाँ रोने के बहाने ढूँढ़ते हैं
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