Sep 10, 2009

कुछ तो नाम कमाना है

छत के ऊपर बादल बरसे,छत के नीचे अपनी आँखें,
तन की इस गीली मिटटी को,धुल-धुल कर बह जाना है.
साँसों के उस पार है मंजिल,कैसे बताये कितनी दूर,
जीवन का जब सत्य येहीं तो, फिर कैसा ये घबराना है.
दुनिया को जिन्होंने भी जीता था,वो भी इससे हार गए,
महल बनाये थे धरती पर,जाने अब कहाँ उनका आशियाना है.
ऐसी इच्छा मत रखो,जिनको कभी न पूरा कर पाओ,
निकल न जाये इन हाथो से फिर,ये जो मौसम बड़ा सुहाना है.
करता है साजिश आज अँधेरा,सीढियों पर यूँ बैठकर,
रौशनी को इक रोज़ हमको जैसे,किस कदर से झुटलाना है
अंजाम-ऐ-सफ़र से क्यूँ डरते हो,जब सब कुछ उसके हाथ है,
उसकी दिखाई हुई राह पर,गुपचुप आगे बढ़ते जाना है.
जो काम करो बस जान लगा दो,पूरे ही अपने अरमान लगा दो,
मरने के बाद भी याद रहे हम सबको,अब ऐसा कुछ तो नाम कमाना है....

No comments:

Post a Comment