कभी सोचता हूँ की मेरे इस जीवन की हकीक़त क्या है?
क्या कभी कटी किसी की इस संसार में अच्छी जिंदगानी है?
गर भुनते ही रहना है मुझको जिंदगी की इस गर्म भट्टी में,
फिर तो मेरा जीवन भी इन संघर्षो की एक और कहानी है.
भला क्यों करू खुशियाँ जाहिर मै अपने ही इस जन्म पर?
जब जानता हूँ की मृत्यु पर रोना भी ज़हान की रीत पुरानी है.
मुझको भी जाना होगा अवश्य अकेले ही उस मोक्ष के मार्ग पर,
तब भी मेरी जिंदगी क्यों हो चुकी मोह-माया में दीवानी है?
मै जब भी करूंगा कोई कोशिश छिपने की मृत्यु के पाश से,
वो मुझे ढूँढ ही लेगी क्योंकि मौत तो सच में बड़ी सयानि है.
अब तो बता, क्यों डरता है तेरा मन मृत्यु से मिलने को मंगल?
जब मृत्यु ही इस संसार में सच की खुद सबसे बड़ी निशानी है.
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