Sep 6, 2009

"इंतज़ार है किसका"






डूब गया वो चमकता हुआ सूरज,

सामने नहीं अब कोई तस्वीर.

हो चुका है उदास हर मंज़र,

जाने मै क्यों बैठा हूँ पहाड़ी पर.

सामने का वो हरा-भरा जंगल,

हो चुका है अब निगाहों से ओझल.

खोयी जाती है घने अँधेरे में नज़र,

छाने लगा है धुंआ सा खजूरों पर.

गूंजने लगे है पक्षी इस वादी में,

घरघराते है आसमान में जोरो से बादल.

शुरू हो चुकी गिरनी बड़ी-बड़ी बूंदे,

भरने वाले है पल भर में सब नाले-पोखर.

बढ़ता ही जाता है अब तो बारिश का जोश,

फिर भी मै बैठा हुआ हूँ यहाँ यूँही खामोश.

और कमबख्त ये राज भी नहीं खुलता मंगल,

की ! आखिर तुझको अब भी इंतज़ार है किसका.........

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