Sep 8, 2009

पत्थर

ये मुल्क है पत्थरो का हर इन्सान है पत्थर यहाँ,
पत्थरों के मुल्क में है हर नज़र पत्थर यहाँ.
पत्थरों से इनके वायदे पत्थरों के जैसा प्यार है,
धड़कने है पत्थरों की दिल-जिगर पत्थर यहाँ.
कभी न पहचंगा कोई इधर हमारे मन के फूल को,
उगलता है हर बात में अब ज़हर हर पत्थर यहाँ.
मुझसी प्यासी रूहे भटकती है कितनी हर-तरफ,
बन गयी है हर नदी -हर नहर अब पत्थर यहाँ.
यूँ तो गूंजती रहती है धुनें घून्गरुओ की हर वक़्त,
पर लगता है की बरसते रहते है हर पहर पत्थर यहाँ.
शाम की रंगीनियों में डूबा हुआ है सबका अपना नसीब,
बन गयी है हमारे लिए तो हर सहर एक पत्थर यहाँ.
कौन पहचानेगा मेरे मन के अन्दर की टीस को,
सो रहा है नींद में बेखबर हर एक पत्थर यहाँ.
चला जाये अब तो दूर कही इस देश से ही ए! मंगल,
बन गयी है तेरे लिए तो हर एक डगर खुद पत्थर यहाँ.

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