Showing posts with label Hindi Poems. Show all posts
Showing posts with label Hindi Poems. Show all posts

Sep 10, 2009

कुछ तो नाम कमाना है

छत के ऊपर बादल बरसे,छत के नीचे अपनी आँखें,
तन की इस गीली मिटटी को,धुल-धुल कर बह जाना है.
साँसों के उस पार है मंजिल,कैसे बताये कितनी दूर,
जीवन का जब सत्य येहीं तो, फिर कैसा ये घबराना है.
दुनिया को जिन्होंने भी जीता था,वो भी इससे हार गए,
महल बनाये थे धरती पर,जाने अब कहाँ उनका आशियाना है.
ऐसी इच्छा मत रखो,जिनको कभी न पूरा कर पाओ,
निकल न जाये इन हाथो से फिर,ये जो मौसम बड़ा सुहाना है.
करता है साजिश आज अँधेरा,सीढियों पर यूँ बैठकर,
रौशनी को इक रोज़ हमको जैसे,किस कदर से झुटलाना है
अंजाम-ऐ-सफ़र से क्यूँ डरते हो,जब सब कुछ उसके हाथ है,
उसकी दिखाई हुई राह पर,गुपचुप आगे बढ़ते जाना है.
जो काम करो बस जान लगा दो,पूरे ही अपने अरमान लगा दो,
मरने के बाद भी याद रहे हम सबको,अब ऐसा कुछ तो नाम कमाना है....

Sep 8, 2009

प्यार की सहर

हर बार जब भी मै तुमको देखता हूँ,
जाने क्यों तुम में ही खो सा जाता हूँ.
या तो तुम करती हो मुझ पर कोई जादू,
या फिर मै तुम्हारे ख्यालो में ही सो जाता हूँ.
या तो तुम हर वक़्त मेरे ही पास रहो!
या फिर तुम ही मेरे जीवन की अकेली आस रहो.
अगर है ये साँचा प्रेम मेरा तुमसे सच में ,
तब तो इसको मेरे प्यासे दिल की एक प्यास कहो.
कुछ ऐसी हो इश्क की ठंडी हवाएं की दोनों हो जम जाये,
या इसी एक पल में ये सारी काएनात सच में थम जाये.
चाहे कुछ भी करे हमको डराने के लिए दुनिया!
ऐतबार करना की मै तुमसे ही प्रेम करता हूँ.
और जब-जब न मिले तुम मुझसे जान-भूझकर,
तब भी मै तेरे ही इश्क की याद में मरता हूँ..
कभी न कभी तो तेरे प्यार की सहर होगी ही मंगल,
तब ही सही मगर मै तुमको प्यार करकर ही रहूँगा.

जीवन-मृत्यु

कभी सोचता हूँ की मेरे इस जीवन की हकीक़त क्या है?
क्या कभी कटी किसी की इस संसार में अच्छी जिंदगानी है?
गर भुनते ही रहना है मुझको जिंदगी की इस गर्म भट्टी में,
फिर तो मेरा जीवन भी इन संघर्षो की एक और कहानी है.
भला क्यों करू खुशियाँ जाहिर मै अपने ही इस जन्म पर?
जब जानता हूँ की मृत्यु पर रोना भी ज़हान की रीत पुरानी है.
मुझको भी जाना होगा अवश्य अकेले ही उस मोक्ष के मार्ग पर,
तब भी मेरी जिंदगी क्यों हो चुकी मोह-माया में दीवानी है?
मै जब भी करूंगा कोई कोशिश छिपने की मृत्यु के पाश से,
वो मुझे ढूँढ ही लेगी क्योंकि मौत तो सच में बड़ी सयानि है.
अब तो बता, क्यों डरता है तेरा मन मृत्यु से मिलने को मंगल?
जब मृत्यु ही इस संसार में सच की खुद सबसे बड़ी निशानी है.

पत्थर

ये मुल्क है पत्थरो का हर इन्सान है पत्थर यहाँ,
पत्थरों के मुल्क में है हर नज़र पत्थर यहाँ.
पत्थरों से इनके वायदे पत्थरों के जैसा प्यार है,
धड़कने है पत्थरों की दिल-जिगर पत्थर यहाँ.
कभी न पहचंगा कोई इधर हमारे मन के फूल को,
उगलता है हर बात में अब ज़हर हर पत्थर यहाँ.
मुझसी प्यासी रूहे भटकती है कितनी हर-तरफ,
बन गयी है हर नदी -हर नहर अब पत्थर यहाँ.
यूँ तो गूंजती रहती है धुनें घून्गरुओ की हर वक़्त,
पर लगता है की बरसते रहते है हर पहर पत्थर यहाँ.
शाम की रंगीनियों में डूबा हुआ है सबका अपना नसीब,
बन गयी है हमारे लिए तो हर सहर एक पत्थर यहाँ.
कौन पहचानेगा मेरे मन के अन्दर की टीस को,
सो रहा है नींद में बेखबर हर एक पत्थर यहाँ.
चला जाये अब तो दूर कही इस देश से ही ए! मंगल,
बन गयी है तेरे लिए तो हर एक डगर खुद पत्थर यहाँ.

मोह्हब्बत की राह

जाने क्या सोच कर मोह्हब्बत की राह पर आगये,
क्या देखा उन्होंने मुझमे ऐसा जो उनको भी भागए.
हमने तो बस शेखी में यूँही कर दिए थे कुछ इशारे,
मगर वो तो फौरन ही असली मुद्दों पर आ गए.
मैंने जो पकड़ना चाहा था हाथो को हल्के से उनके,
वो तो एकदम से ही मेरे इन पहलुओ में समां गए.
बीच-बीच में थोडी-थोडी शरारत भी चलती रही,
और वो इस तरह से हमे प्यार करना ही सिखा गए.
अचानक से छु गयी थी उंगलिया उनके नाजुक लबो से,
और वो लेकर अपने लबो को हमारे लबो में ही समां गए.
काफी देर तक युही कोशिश करता रहा था उन पर मंगल,
तो आखिर में वो बोले की तुम भी अब जवानी में आ गए.

यादें

इसकी यादें उसकी यादें,
आखिर मुझको क्यों आती है?
कल के उन भूले-बिसरे से पलो में ले जाती है.
क्यों उस वक़्त के चंद लम्हे
आज की एक मुद्दत में बदल से जाते है!
याद कर उन खास पलो को ,
होते है कभी गुस्सा तो कभी मुस्काते है.
अक्सर मेरी यादों में एक अजीब हूक सी उठती है!
जो पल भर मे किसी अपने को गैर
और किसी गैर को बिलकुल अपना करती है.
कभी भीनी सी खुशबू मे महकी यादें
बचपन मे खाई मिटटी की डली सी बन जाती है,
तो कभी वही यादें बिदाई की बेला पर
याद कर बहन की बातो को अकेले मे रुलाती है.
तभी तो रोज़ ही खुद से पूछता है मंगल,
की आखिर ये यादें क्यों आती है?

यादो के जुगनू

रात के अंधेरो में यादो के जुगनू चमकते रहे,
रुकी हुई हवा में भी दर्द के फूल महकते रहे.
उनकी शोला आँखों से ये सर्द निगाहे क्या मिली,
मेरे सारे बदन के अन्दर अंगारे से दहकते रहे.
चाँद तो भटकता रहा है सूरज की तलाश में,
मेरे इस सुने दिल के आसमा मे तारे झपकते रहे,
गम की इन्तहा न पूछो बता नहीं पाउँगा तुमको,
उनके इंतजार मे मेरे जख्म तो रोते-बिलखते रहे.
उसकी चाहत का तो कोई सुराग न पा सका मंगल,
बाकी रिश्ते भी एक-एक कर हाथो से खिशकते रहे.