Sep 6, 2009

"रहनुमाई"


माना की तमाम उम्र तुम अब दिखाई न दोगे,

फिर भी मेरी गजलों में सिर्फ तुम ही सुनाई दोगे.

मेरी तबाही का जब भी तुझ पर इल्जाम होगा,

तब-तब इस ज़माने को क्या -क्या सफाई दोगे.

माना की हमको तो भरमा लिया उस खुदा के नाम से,

जब खुद खुदा ही मिलगा तो किसकी उसे दहाई दोगे.

हा तुम मेरे हमदर्द थे मगर इतने भी न थे सनम,

की मुझे मेरे गम की जगह कोई खुशी की दवाई दोगे.

हम तो सदा एक गम की नदी थे और नदी ही रहेंगे,

किस तरह इस नदी को खुशी के समन्दर की गहराई दोगे.

खुद तो भटकते रहते हो सदा मंजिल की तलाश में मंगल,

अब तुम औरो को कैसे इस तपते रेगिस्तान में रहनुमाई दोगे........

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